पहाड़ के उस छोटे से गाँव में एक घर है,
जो हर साल दीपावली से पहले साफ़ होता है।
दरवाज़े पर लगा ताला खुलता है,
आँगन में जमी काई हटाई जाती है,
और खिड़कियों से झाँकती धूल को
मानो किसी अपने के लौटने की उम्मीद में झाड़ दिया जाता है।
घर बूढ़ा हो गया है,
पर उसकी उम्मीद जवान है।

🌾
इस घर में कभी हँसी गूँजा करती थी।
सुबह-सुबह चूल्हे की आग,
बर्तन की आवाज़,
और आँगन में भागते बच्चों के कदम।
अब सुबह होती है,
पर आवाज़ें नहीं।
बस हवा आती है,
दरवाज़े से टकराती है
और चली जाती है—
जैसे किसी ने दस्तक दी हो,
पर रुकने का इरादा न हो।
🌄
गाँव वाले इस घर को जानते हैं।
कहते हैं—
“यह घर किसी का इंतज़ार करता है।”
किसका?
कोई नहीं जानता।
शायद उस बेटे का
जो शहर गया था “बस दो साल” के लिए।
या उस बेटी का
जिसने वादा किया था—
“अगली दीपावली आऊँगी।”
हर साल वही दीपावली आती है,
पर लोग नहीं।
🪔
दीपावली की शाम
घर के आँगन में दीया जलता है।
कोई उसे जलाने नहीं आता,
फिर भी वह जलता है।
शायद घर खुद जलाता है।
दीया काँपता है,
हवा से नहीं—
उम्मीद से।
🏔️
रात को
जब पूरा गाँव सो जाता है,
तो यह घर जागता है।
खिड़कियाँ चुपचाप पहाड़ों को देखती हैं,
दरवाज़ा रास्ते की ओर टिका रहता है,
और दीवारें
पुरानी आवाज़ों को याद करती हैं।
“अब आ गए?”
“थक गए होंगे…”
“कल आराम कर लेना…”
🌙
सुबह होती है।
सूरज निकलता है।
ताला फिर लग जाता है।
घर चुप हो जाता है।
पर इंतज़ार नहीं करता।
क्योंकि कुछ घर
ताले से नहीं,
उम्मीद से बंद होते हैं।
और कुछ घर
खाली होकर भी
सबसे ज़्यादा भरे होते हैं।
